बैनर वाले टैंकरों से बुझेगी प्यास! सिंध परियोजना पर करोड़ों खर्च के बाद भी पानी को तरसा शहर

शिवपुरी। भीषण गर्मी और पेयजल संकट से जूझ रहे शिवपुरी शहर में शुक्रवार की शाम मौसम मेहरबान हुआ तो शनिवार को नेताओं के बैनर लगे पानी के टैंकर भी सड़कों पर दौड़ते नजर आए। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, भाजपा महामंत्री लवलेश जैन और योगेंद्र यादव, ईंजी. पवन जैन के फोटो लगे टैंकर विभिन्न क्षेत्रों में पानी पहुंचाते दिखाई दिए। बड़े टैंकर जहां सम्पवेल भरने में लगाए गए हैं, वहीं छोटे टैंकर घर-घर पानी पहुंचाने के लिए मैदान में उतार दिए गए हैं।
शहरवासियों का कहना है कि पानी की आपूर्ति होना राहत की बात है, लेकिन सवाल यह है कि करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी शिवपुरी को फिर टैंकरों के भरोसे क्यों होना पड़ रहा है। सिंध जलावर्धन योजना पर शुरुआती 54 करोड़ रुपए से बढ़कर लगभग 200 करोड़ रुपए तक खर्च किए जा चुके हैं, इसके बावजूद गर्मी के दिनों में जल संकट गहराना व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है।
जानकार बताते हैं कि शिवपुरी शहर की स्थापना के समय सिंधिया राजघराने ने जल संरक्षण को ध्यान में रखते हुए शहर और आसपास 18 तालाबों की श्रृंखला विकसित कराई थी। ये तालाब आपस में नालों के माध्यम से जुड़े हुए थे और वर्षा जल संरक्षण का मजबूत आधार थे। समय के साथ अधिकांश तालाब अतिक्रमण और अव्यवस्थित विकास की भेंट चढ़ गए। जल पुनर्भरण के प्राकृतिक स्रोत खत्म होते गए, जबकि शहर में सैकड़ों निजी और सरकारी ट्यूबवेल खोद दिए गए। नतीजतन भूजल स्तर लगातार नीचे जाता गया और अब कई स्थानों पर एक हजार फीट गहराई तक भी पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा।
जल संकट के बीच शहर में टैंकरों की एंट्री ने लोगों को राहत जरूर दी है, लेकिन इसके साथ ही कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। यदि जल सुनवाई और पेयजल प्रबंधन की तैयारियां समय रहते की गई थीं, तो फिर मोटरों की खराबी, जल आपूर्ति में बाधा और टैंकरों पर निर्भरता जैसी स्थिति क्यों बनी? आखिर करोड़ों रुपए की परियोजनाओं और प्रशासनिक तैयारियों के बावजूद शिवपुरी को हर गर्मी में पानी के संकट का सामना क्यों करना पड़ रहा है?
फिलहाल शहर की जनता को टैंकरों से पानी मिल रहा है, लेकिन यह व्यवस्था स्थायी समाधान नहीं मानी जा रही। लोगों की नजर अब इस बात पर है कि जिम्मेदार विभाग और प्रशासन भविष्य में ऐसे संकट से निपटने के लिए क्या ठोस कदम उठाते हैं।
