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झोलाछाप के इंजेक्शन ने छीना एक घर का चिराग: 8 वर्षीय मासूम की मौत,सोता स्वास्थ्य विभाग बसूली करके फिर सो जाएगा ?

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सतेन्द्र उपाध्याय शिवपुरी। जिले के लुकवासा कस्बे से एक बेहद दर्दनाक मामला सामने आया है। यहां बुखार के इलाज के लिए एक कथित झोलाछाप डॉक्टर के पास ले जाए गए 8 वर्षीय मासूम की इलाज के दौरान हालत बिगड़ गई। परिजनों का आरोप है कि इंजेक्शन लगाने के कुछ ही देर बाद बच्चे का हाथ सूज गया और उसकी तबीयत तेजी से खराब होने लगी। बाद में ग्वालियर में उपचार के दौरान मासूम की मौत हो गई। घटना के बाद क्षेत्र में आक्रोश का माहौल है और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं।

मृतक की पहचान कुलदीप वाल्मीकि (8 वर्ष), निवासी लुकवासा के रूप में हुई है। परिजनों के अनुसार कुलदीप को बुखार आने पर उसकी मां सोनम उसे लुकवासा में क्लीनिक संचालित करने वाले बंटी उर्फ गोविंद गोयल के पास इलाज के लिए लेकर गई थीं। परिजनों का आरोप है कि गोविंद गोयल बिना वैध चिकित्सकीय योग्यता के लंबे समय से क्लीनिक संचालित कर रहा है।

मृतक की मां सोनम ने बताया कि डॉक्टर ने बच्चे को इंजेक्शन लगाया। इंजेक्शन लगते ही बच्चे का हाथ तेजी से फूलने लगा। जब उन्होंने इसकी शिकायत की तो डॉक्टर ने कथित रूप से इंजेक्शन और चढ़ाई जा रही बोतल बंद कर दी, हाथ की मालिश की और बच्चे को घर भेज दिया।

परिजनों का कहना है कि घर पहुंचने के कुछ ही देर बाद बच्चे की हालत अचानक बिगड़ गई। वह असामान्य हरकतें करने लगा और अपने ही दांतों से खुद को काटने लगा। घबराए परिजन उसे तुरंत शिवपुरी मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने उपचार शुरू किया, लेकिन हालत गंभीर होने पर उसे ग्वालियर रेफर कर दिया गया। ग्वालियर में इलाज के दौरान मासूम कुलदीप ने दम तोड़ दिया।

घटना के बाद परिजनों में गहरा आक्रोश है। उनका आरोप है कि यदि समय रहते सही इलाज मिलता और कथित झोलाछाप डॉक्टर लापरवाही नहीं करता तो उनके बेटे की जान बच सकती थी। परिवार ने मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

इस घटना ने जिले में कथित झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे कई अवैध क्लीनिक खुलेआम संचालित हो रहे हैं, लेकिन विभाग समय रहते कार्रवाई नहीं करता। लोगों का आरोप है कि अक्सर किसी बड़ी घटना के बाद केवल क्लीनिक बंद कराने जैसी औपचारिक कार्रवाई की जाती है। उसके बाद भेंट मिलने पर इन्हें मौत का लाइसेंस दे दिया जाता है। इस मामले में परिवार ने चिकित्सक पर कार्यवाही की मांग की है।

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