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शिकायत तो कर दी, पर कोर्ट में बहस नहीं कर पाएंगे पार्षद: पढ़िए नपा घोटाले में हाईकोर्ट ने क्यों दिया झटका…

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शिवपुरी। शिवपुरी नगर पालिका में हुए करोड़ों रुपये के कथित सड़क निर्माण घोटाले को लेकर ग्वालियर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करने वाला कोई भी निजी व्यक्ति या निर्वाचित पार्षद, मुकदमे के दौरान सरकारी वकील (लोक अभियोजक) की भूमिका नहीं निभा सकता। अदालत के इस फैसले ने कानून की निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया की मर्यादा को सर्वोपरि रखा है।

निष्पक्ष सुनवाई के लिए सरकारी वकील ही अनिवार्य
ग्वालियर हाईकोर्ट के जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने पार्षद विजय शर्मा की याचिका को खारिज करते हुए सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि सत्र न्यायालय में मुकदमे की पैरवी करने और गवाहों से जिरह (Cross-examination) करने का अधिकार विशेष रूप से केवल लोक अभियोजक को ही प्राप्त है। किसी शिकायतकर्ता को सीधे अभियोजन की शक्तियां देना न केवल कानून की मूल भावना के खिलाफ है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकता है।

क्या थी पार्षदों की विशेष मांग?
नगर पालिका के इस बहुचर्चित घोटाले में शिकायतकर्ता पार्षद विजय शर्मा ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उन्हें सरकारी वकील के साथ मिलकर गवाहों से सवाल-जवाब करने और अंतिम बहस में सक्रिय रूप से शामिल होने की अनुमति दी जाए। पार्षदों का तर्क था कि चूंकि भ्रष्टाचार की पोल उन्होंने ही खोली है और मामले की सूक्ष्म जानकारी उनके पास है, इसलिए उनकी भागीदारी से केस मजबूत होगा।

BNSS के दायरे में सीमित हैं अधिकार
माननीय हाईकोर्ट ने पार्षदों की इस मांग को कानूनी सीमाओं से बाहर बताते हुए नामंजूर कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधानों के तहत, सत्र न्यायालय में मुकदमा चलाने का एकाधिकार केवल शासन द्वारा नियुक्त लोक अभियोजक के पास है। कोर्ट ने माना कि अभियोजन की जिम्मेदारी एक तटस्थ सरकारी तंत्र की है, न कि किसी निजी पक्ष की।

शिकायतकर्ता के पास अब क्या विकल्प?
अदालत ने अपने आदेश में यह भी साफ किया कि शिकायतकर्ता पक्ष पूरी तरह मूकदर्शक नहीं रहेगा। कानून के अनुसार, शिकायतकर्ता का वकील केवल लिखित सुझाव या लिखित तर्क (Written Arguments) प्रस्तुत कर सकता है। यह प्रक्रिया भी तभी संभव है जब गवाही का चरण पूर्ण हो जाए और अदालत इसकी अनुमति दे। साथ ही, यह सब भी सरकारी वकील के निर्देशन और समन्वय में ही किया जा सकेगा।

भ्रष्टाचार बनाम निष्पक्षता की जंग
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि यदि किसी निजी व्यक्ति को सीधे जिरह और बहस का अधिकार मिल जाए, तो मुकदमे की निष्पक्षता खतरे में पड़ सकती है। व्यक्तिगत हितों या प्रतिशोध की भावना से न्यायिक प्रक्रिया को बचाने के लिए ही कानून ने अभियोजन की कमान केवल सरकारी पक्ष के हाथों में सुरक्षित रखी है।

क्या है पूरा भ्रष्टाचार कांड
यह पूरा विवाद 21 जुलाई 2025 को शुरू हुआ था, जब शिवपुरी नगर पालिका के 21 पार्षदों ने कलेक्टर को एक संयुक्त शिकायत सौंपी थी। आरोप था कि शहर में करोड़ों रुपये की लागत वाली सड़कें केवल कागजों पर बनाई गईं और उनका भुगतान भी निकाल लिया गया। धरातल पर निर्माण कार्य या तो अधूरे थे या फिर उनका अस्तित्व ही नहीं था। इस शिकायत ने पूरे प्रशासन में हड़कंप मचा दिया था।

जांच के बाद हुई थी FIR
प्रशासनिक जांच में पार्षदों के आरोप सही पाए जाने पर कोतवाली पुलिस ने कड़ी कार्रवाई की थी। पुलिस ने सब इंजीनियर जितेंद्र परिहार, सतीश निगम और ठेकेदार अर्पित शर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और धोखाधड़ी की संगीन धाराओं में एफआईआर दर्ज की थी। इसी मामले में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए पार्षदों ने हाईकोर्ट का रुख किया था, जहां से अब स्थिति पूरी तरह साफ हो गई है।

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